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सोमवार, 11 मार्च 2019

ग़ज़ल

संभल जाता हूँ मैं चाहे डगर चिकनी हो।
भले आदत लाख बहकने की अपनी हो।

कम बोलो और सोच, समझ के बोलो तुम,
लेकिन जब बोलो बात तो बात वज़नी हो।

मुक़ाबला किया डट के हार की फ़िक्र किसे,
अगर शोहरत हो मेरी तो तेरी जितनी हो।

झूठ बोलूंगा नहीं किसी दबाव में आकर,
तेरी तरफ़ से भले ही साज़िश कितनी हो।

झुकाउंगा नहीं सिर मैं सामने 'तनहा' तेरे,
ये गर्दन कट जाए चाहे जब कटनी हो।
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©मोहसिन 'तनहा'🇮🇳

रविवार, 3 मार्च 2019

युद्धों ने दिया है (कविता)

युद्धों ने दिया है
झुलसता नंगा बचपन,
बदसूरती जो छिपाए न छिपे,
हर तरफ़ आग ही आग
और बदबूदार धुँआ,
बेतहाशा भूख, प्यास और
झुलसाती धूप, जमा देने वाली ठंड
अंतहीन पीड़ा,
अपनों के मारे जाने की,
बेघर होकर शरणार्थी बनने की,
दवाओं, पानी और
रोटी के टुकड़ों की भीख।

युद्धों ने दिया है
कोख में मारे जाने वाला घना अंधेरा,
भटकन भरे दिन और
भयानक रातें
स्कूलों के मलबे में दबी हुई किताबें,
लाशों के बीच
अपने मालिक को सूंघता हुआ कुत्ता,
उजड़े हुए घर
हर तरफ़ गर्दज़ाद मंज़र।

युद्धों ने दिया है
उजड़े हुए शहर का सूनापन,
हर तरफ़ रेंगती हुई मनहूसियत
बिजलियों के टूटे खंबे
कुएं, तालाब और नदियों का
काला, ज़हरीला पानी
थरथराती हवा की बेचारगी
आवारा हुए ज़ख़्मी जानवर।

युद्धों ने दिया है
सपनों का टूट जाना
इच्छाओं की हत्या
अधूरी अंधेरे भरी ज़िंदगी
ख़ुशबुओं का मर जाना
तितलियों का चट्टान हो जाना
रंगों का बेरंग हो जाना।

युद्धों ने दिया है
काम पर से घर न पहुंच पाना
चाभी जेब मे हो और
घर का ढह जाना
पालतू परिंदे की
बिना मालिक के मौत हो जाना।

युद्धों ने दिया है
आदमी का आदमी के हाथों मारे जाना।
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©डॉ. मोहसिन खान🇮🇳

मंगलवार, 1 मई 2018

रचना

मैं मज़दूर हूँ पास मेरे मेहनत-मशक्क़त है।
तभी तो आपकी ऐसी शान-ओ-शौक़त है।

आपके हिस्से, सहूलियत ही सहूलियत है,
मेरे हिस्से, भूख, दर्द और बड़ी मुसीबत है।

मैं अपना भी नहीं और कोई मेरा भी नहीं,
ये क्या रिश्ता है के सबको मेरी ज़रूरत है।

बिकता हूँ कभी चौराहे पे कभी सड़क पे,
ख़रीदारों वैसे मेरे हुनर की बड़ी क़ीमत है।

'तनहा' ये जो है तरक़्क़ी का सारा मंज़र,
सब  ये  हमारी  महारत  की बदौलत है।
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©मोहसिन 'तनहा'🇮🇳

बुधवार, 15 नवंबर 2017

कुंवर नारायण परिचय एवं कविता
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कुंवर नारायण (19 सितम्बर, 1927, फैजाबाद, उत्तर प्रदेश) हिन्दी के सम्मानित कवियों में गिने जाते हैं। कुंवर जी की प्रतिष्ठा और आदर हिन्दी साहित्य की भयानक गुटबाजी के परे सर्वमान्य है। उनकी ख्याति सिर्फ़ एक लेखक की तरह ही नहीं, बल्कि कला की अनेक विधाओं में गहरी रुचि रखने वाले रसिक विचारक के समान भी है। कुंवर नारायण को अपनी रचनाशीलता में इतिहास और मिथक के माध्यम से वर्तमान को देखने के लिए जाना जाता है। उनका रचना संसार इतना व्यापक एवं जटिल है कि उसको कोई एक नाम देना सम्भव नहीं है। फ़िल्म समीक्षा तथा अन्य कलाओं पर भी उनके लेख नियमित रूप से पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हैं। आपने अनेक अन्य भाषाओं के कवियों का हिन्दी में अनुवाद किया है और उनकी स्वयं की कविताओं और कहानियों के कई अनुवाद विभिन्न भारतीय और विदेशी भाषाओं में छपे हैं। 'आत्मजयी' का 1989 में इतालवी अनुवाद रोम से प्रकाशित हो चुका है। 'युगचेतना' और 'नया प्रतीक' तथा 'छायानट' के संपादक-मण्डल में भी कुंवर नारायण रहे हैं।
19 सितम्बर, 1927 ई. को कुंवर नारायण का जन्म उत्तर प्रदेश के फैजाबाद ज़िले में हुआ था। कुंवर जी ने अपनी इंटर तक की शिक्षा विज्ञान वर्ग के अभ्यर्थी के रूप में प्राप्त की थी, किंतु साहित्य में रुचि होने के कारण वे आगे साहित्य के विद्यार्थी बन गये थे। उन्होंने 'लखनऊ विश्वविद्यालय' से 1951 में अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. किया। 1973 से 1979 तक वे'संगीत नाटक अकादमी' के उप-पीठाध्यक्ष भी रहे। कुंवर जी ने 1975 से 1978 तक अज्ञेय द्वारा सम्पादित मासिक पत्रिका में सम्पादक मंडल के सदस्य के रूप में भी कार्य किया। कुंवर नारायण की माता, चाचा और फिर बहन की असमय ही टी.बी. की बीमारी से मृत्यु हो गई थी। बीमारी से उनकी बहन बृजरानी की मात्र 19 वर्ष की अवस्था में ही मृत्यु हुई थी। कार चलाना कुंवर जी का पैतृक व्यवसाय रहा था। लेकिन इसके साथ-साथ उन्होंने साहित्य जगत में भी अपना प्रवेश कर लिया।
लेखन कार्य
कुंवर नारायण इस दौर के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार हैं। उनकी काव्ययात्रा 'चक्रव्यूह' से शुरू हुई थी। इसके साथ ही उन्होंने हिन्दी के काव्य पाठकों में एक नई तरह की समझ पैदा की। यद्यपि कुंवर नारायण की मूल विधा कविता ही रही है, किंतु इसके अलावा उन्होंने कहानी, लेख व समीक्षाओं के साथ-साथ सिनेमा, रंगमंच एवं अन्य कलाओं पर भी बखूबी अपनी लेखनी चलायी। इसके चलते जहाँ उनके लेखन में सहज ही संप्रेषणीयता आई, वहीं वे प्रयोगधर्मी भी बने रहे। उनकी कविताओं और कहानियों का कई भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है। 'तनाव' पत्रिका के लिए उन्होंने कवाफी तथा ब्रोर्खेस की कविताओं का भी अनुवाद किया।
चक्रव्यूह
कुँवर नारायण हमारे दौर के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार हैं। उनकी काव्ययात्रा 'चक्रव्यूह' से शुरू हुई। इसके साथ ही उन्होंने हिन्दी के काव्य पाठकों में एक नई तरह की समझ पैदा की।
परिवेश हम तुम
उनके संग्रह 'परिवेश हम तुम' के माध्यम से मानवीय संबंधों की एक विरल व्याख्या हम सबके सामने आई।
आत्मजयी
उन्होंने अपने प्रबंध 'आत्मजयी' में मृत्यु संबंधी शाश्वत समस्या को कठोपनिषद का माध्यम बनाकर अद्भुत व्याख्या के साथ हमारे सामने रखा। इसमें नचिकेता अपने पिता की आज्ञा, 'मृत्य वे त्वा ददामीति' अर्थात मैं तुम्हें मृत्यु को देता हूँ, को शिरोधार्य करके यम के द्वार पर चला जाता है, जहाँ वह तीन दिन तक भूखा-प्यासा रहकर यमराज के घर लौटने की प्रतीक्षा करता है। उसकी इस साधना से प्रसन्न होकर यमराज उसे तीन वरदान माँगने की अनुमति देते हैं। नचिकेता इनमें से पहला वरदान यह माँगता है कि उसके पिता वाजश्रवा का क्रोध समाप्त हो जाए।
वाजश्रवा के बहाने
कुँवर नारायण ने हिन्दी के काव्य पाठकों में एक नई तरह की समझ पैदा की। नचिकेता के इसी कथन को आधार बनाकर कुँवर नारायणजी की जो कृति 2008 में आई, 'वाजश्रवा के बहाने', उसमें उन्होंने पिता वाजश्रवा के मन में जो उद्वेलन चलता रहा उसे अत्यधिक सात्विक शब्दावली में काव्यबद्ध किया है। इस कृति की विरल विशेषता यह है कि 'अमूर्त'को एक अत्यधिक सूक्ष्म संवेदनात्मक शब्दावली देकर नई उत्साह परख जिजीविषा को वाणी दी है। जहाँ एक ओर आत्मजयी में कुँवरनारायण जी ने मृत्यु जैसे विषय का निर्वचन किया है, वहीं इसके ठीक विपरीत 'वाजश्रवा के बहाने'कृति में अपनी विधायक संवेदना के साथ जीवन के आलोक को रेखांकित किया है।
प्रमुख कृतियाँ
इनकी प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित हैं-
कविता संग्रह - चक्रव्यूह (1956), तीसरा सप्तक (1959),परिवेश : हम-तुम (1961), अपने सामने (1979), कोई दूसरा नहीं (1993), इन दिनों (2002)।खंड काव्य - आत्मजयी (1965) और वाजश्रवा के बहाने (2008)।
कहानी संग्रह - आकारों के आसपास (1973)।
समीक्षा विचार - आज और आज से पहले (1998), मेरे साक्षात्कार (1999), साहित्य के कुछ अन्तर्विषयक संदर्भ (2003)।
संकलन - कुंवर नारायण-संसार(चुने हुए लेखों का संग्रह)2002,कुँवर नारायण उपस्थिति (चुने हुए लेखों का संग्रह)(2002), कुँवर नारायण चुनी हुई कविताएँ (2007), कुँवर नारायण- प्रतिनिधि कविताएँ (2008)
पुरस्कार व सम्मान
कुंवर नारायण को 2009 में वर्ष 2005 के 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। उन्हें 6 अक्टूबर को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने देश के सबसे बड़े साहित्यिक सम्मान से सम्मानित किया। कुंवर जी को 'साहित्य अकादमी पुरस्कार', 'व्यास सम्मान', 'कुमार आशान पुरस्कार', 'प्रेमचंद पुरस्कार', 'राष्ट्रीय कबीर सम्मान', 'शलाका सम्मान', 'मेडल ऑफ़ वॉरसा यूनिवर्सिटी', पोलैंड और रोम के 'अन्तर्राष्ट्रीय प्रीमियो फ़ेरेनिया सम्मान' और 2009 में 'पद्मभूषण' से भी सम्मानित किया जा चुका है।

एक अजीब-सी मुश्किल संस्पर्श और अनुभूति (कविता)
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कुंवर नारायण की कविता ‘एक अजीब सी-मुश्किल’ जीवन की सच्चाइयों और मन की सम्वेदनाओं की कविता है जिसके अंतर्गत  कवि ने मन की स्थिति का चित्रण करते हुए सामाजिक सांप्रदायिक अवस्थाओं का चित्रण किया है और आपसी समन्वय का संदेश प्रस्तुत किया है मूल रूप से यह कविता मानवीय प्रेम की कविता है जहां पर धर्म जाति रंग नस्लें अमीरी गरीबी आदि भेद नहीं माना जाता है कवि ने इसी समन्वयात्मक था सहिष्णुता को बड़ी गंभीरता के साथ शब्दों में ढाला है कवि ने अपनी कविता में उन समस्त स्थितियों का चित्रण किया है जहां पर व्यक्ति दिन रात कभी धर्म को लेकर कभी मान्यताओं को लेकर कभी संस्कृति को लेकर कभी परंपराओं कभी भाषा इत्यादि को लेकर टकराहट पैदा करता है और एक दूसरे से विरोध जताता है परंतु कभी कहना चाहता है कि विरोध की कोई जरूरत नहीं है हम सब आपस में एक दूसरे के सहयोगी ही है इसका कारण यह है कि हमने एक दूसरे को बहुत कुछ दिया है एक दूसरे की संस्कृति में एक दूसरे को आगे बढ़ाया है और नई सी नई चीजों को उपलब्ध कराया है। कवि कुंवर नारायण स्पष्ट करते हैं कि कोई कितनी ही ताकत से किसी से नफरत करें लेकिन यह नफरत बहुत ज्यादा दिनों तक ठीक नहीं पाएगी इसका कारण यह है कि नफरत से संसार नहीं चलता है संसार चलता है एक दूसरे के सहयोग से और सहिष्णुता से इसीलिए वह दर्शाते हैं कि यदि अंग्रेजों से भी नफरत की जाए तो किस आधार पर नफरत की जाए क्योंकि अंग्रेजों की दी हुई संपत्ति में हुई चीजें दिए हुए कवि दिए हुए कितने ही एहसान ऐसे हैं जो हम ने अंग्रेजो से उधार लिए हैं तो हम कैसे उनसे नफरत कर सकते हैं? इसी तरह से भारत में कई ऐसे संप्रदाय धर्म और जातियां रहती हैं जिनसे चाह कर भी नफरत नहीं की जा सकती है चाहे वह हिंदू मुस्लिम सिख इसाई किसी भी धर्म और जाति के हैं उनकी परंपराएं उनकी भाषा उनके धर्म ग्रंथ उनकी संस्कृति ने हमें प्रभावित किया है और हमने उनसे बहुत कुछ सीखा है उनके कवि उनके लेखक हमारे जीवन के हिस्से बन चुके हैं इसलिए कैसे दूसरी जाति और धर्म संप्रदाय से नफरत की जा सकती है? इस स्थिति को कवि निम्न पंक्तियों में दर्शा रहा है-
"एक अजीब-सी मुश्किल में हूं इन दिनों-
 मेरी भरपूर नफरत कर सकने की ताकत
दिनों दिन क्षीण पड़ती जा रही
अंग्रेजों से नफरत करना चाहता
जिन्होंने दो सदी हम पर राज किया
तो शेक्सपियर आड़े आ जाते
जिनके मुझ पर न जाने कितने एहसान हैं
मुसलमानों से नफरत करने चलता
तो सामने गालिब आकर खड़े हो जाते
अब आप ही बताइए किसी की कुछ जलती है
उनके सामने?"
 कवि कुंवर नारायण अपनी कविता में स्पष्ट करते हैं कि चाहे किसी से कितनी ही नफरत की जाए एक न एक दिन यह नफरत कमजोर पड़ जाती है क्योंकि यह भारत देश सामाजिक संस्कृतियों का देश है यहां पर कई धर्म जाति रंग रूप नस्ल वाले लोग एक साथ रहते हैं और भारत के निर्माण में इन सभी की समान भूमिका  लोक जाति के आधार पर नफरत करें संस्कृति के आधार पर या धर्म के आधार पर वह बहुत दिन तक नफरत नहीं कर सकते हैं। क्योंकि कई लोगों के साथ उनके संबंध निकट से जुड़े होते हैं और इन संबंधों को वह भुला नहीं पाता है इसीलिए हम समन्वय से काम लेते हैं और एक दूसरे के पूरक बनकर देश में उपस्थित होते हैं। पूरब से लेकर पश्चिम उत्तर से लेकर दक्षिण विशाल भूमि तक अगर हम घूम कर आएं तो कई लोग हमारे जीवन में ऐसे नजर आएंगे जिससे हमारा गहरा नाता जोड़ा हुआ है। हम चाहकर भी उस संस्कृति उस नाते को उन लोगों को भूल नहीं पाएंगे क्योंकि सभी से हमारा गहरा जुड़ाव बचपन से अब तक दिखाई देता है, इसलिए लाख चाहकर भी हम किसी से कभी भी नफरत नहीं कर सकते हैं। हम कितना ही अपने आप को समझा लें कि यह लोग हमारे नहीं उनकी नस्लें, रंग, संस्कृति, धर्म, जाति अलग है परंतु ऐसा नहीं है वह भिन्न होकर भी अभिन्न है और हमारे होकर ही रहते हैं।. इसलिए कवि बहुत आश्चर्य के साथ व्यक्त करता है कि-
"सिखों से नफरत करना चाहता
तो गुरु नानक आंखों में छा जाते
और सिर्फ अपने आप झुक जाता
और यह कंबन, त्यागराज, मुत्तुस्वामी....
लाख समझाया अपने को
कि वह मेरे नहीं
दूर कहीं दक्षिण के हैं
पर मन हे कि मानता ही नहीं
बिना उन्हें अपनाएं।"
  कवि कुंवर नारायण अपने निजी जीवन की अवस्था को दर्शाते हुए कहते हैं कि मैंने अपनी प्रेमिका से भी बहुत नफरत करने की कोशिश की इस हद तक नफरत करने की कोशिश की यदि वह मुझे मिल जाए तो मैं उसका खून कर दूं, लेकिन ना जाने क्यों मेरा मन बदल जाता है। क्योंकि वह नफरत करने के काबिल नहीं है और मैं नफरत इतनी ही करूं मेरा भी मन बदल जाता है। क्योंकि मेरी प्रेमिका जब भी मुझसे मिलती है तो कभी मित्र बनकर कभी मां बनकर कभी बहन की तरह तो मेरा मन बदल जाता है यह सिर्फ प्यार ही है जिसके कारण मैं नफरत नहीं कर पाता हूं इसलिए कभी कहते हैं कि-
"और वह प्रेमिका
 जिससे मुझे पहला धोखा हुआ था
मिल जाए तो उसका खून कर दूँ!
मिलती भी है, मगर
कभी मित्र
कभी माँ
कभी बहन की तरह
तो प्यार का घूंट पीकर रह जाता।"
  कुंवर नारायण अपनी कविता के अंत में स्पष्ट करना चाहते हैं कि मैं इतनी ही नफरत कर लूं लेकिन नफरत मेरे भीतर से जन्म ले ही नहीं पाती है। मैं कितना ही पागलों की तरह भटकता रहा हूं कि कोई ऐसी व्यक्ति मिल जाए जिससे मैं भरपूर नफरत करता हूं ताकि मेरा दिल हल्का हो जाए, लेकिन यह कार्य हो नहीं पाता मैं अपने कार्य में असफल हो जाता हूं और मेरी सारी कोशिश खत्म हो जाती है। कवि नफरत करना चाहता है, लेकिन उसे नफरत करने के लायक कोई व्यक्ति मिल नहीं पाता है। यही कवि दर्शाना चाहता है कि यहां इस धरती पर नफरत की जगह नहीं है, बल्कि जगह तो सच में प्रेम की है समन्वय की है, सहिष्णुता की है। हमें एक-दूसरे से प्रेम करके ही आगे बढ़ना चाहिए। इसीलिए कवि कहता है कि मैं जब भी नफरत करने जाता हूं तो ठीक इसका उल्टा ही होता है। कहीं कोई नफरत के काबिल व्यक्ति मुझे मिलता ही नहीं है कि मैं उससे नफरत कर लूं। हर बार मैं नफरत करने जाता हूं, उल्टा मुझे ही प्यार मिलने लगता है।  मेरा यह प्यार करो एक न एक दिन मेरी जान ले लेगा। कवि प्रेम को लेकर बहुत आश्वस्त है और कहना चाहता है कि प्रेम ही इस दुनिया को बनाने वाला है-
"हर समय
 पागलों की तरह भटकता रहता है
 कि कहीं कोई ऐसा मिल जाए
 जिस से भरपूर नफरत करके
 अपना जी हल्का कर लूं।
 पर होता है इसका ठीक उल्टा
 कोई न, कोई कहीं न कहीं, कभी न कभी
 ऐसा मिल जाता
 जिससे प्यार किए बिना रही नहीं पाता।
 दिनों दिन मेरा यह प्रेम रोग बढ़ता ही जा रहा
 और इस वहम ने पक्की जड़ पकड़ ली है
 कि वह किसी दिन मुझे
 स्वर्ग दिखाकर ही रहेगा।"
 निष्कर्ष-
 उपरोक्त विवेचन के उपरांत स्पष्ट किया जा सकता है कि कवि ने अपनी कविता में प्रेम का संदेश देने का भरसक प्रयास किया है। कवि मानता है कि इस धरती पर नफरत का कोई स्थान नहीं है चाहे किसी से कितनी ही नफरत कर लो लेकिन उनके धर्म उनकी संस्कृति उनकी जाति या उनकी कोई मान्यताएं परंपराएं ऐसी आपके सामने आकर खड़ी हो जाएंगे जिससे आप जहां पर भी नफरत नहीं कर पाएंगे। कवि को स्पष्ट करता है कि हमारे भारत की सामासिक संस्कृति के कारण हमारी पहचान है और यहां के कई अद्भुत व्यक्ति हमें प्रभावित करते हैं। हम चाह कर भी उन लोगों का विरोध नहीं कर सकते या उनसे नफरत नहीं कर सकते जो हमें विरोधी नजर आते हैं वास्तव में विरोध और नफरत तो समाज में ही ही नहीं यह हमारे मन का भ्रम है जो हम विरोध और नफरत कर रहे हैं वरना हम अपनी अपनी विशेषताओं के साथ जीने वाले लोग हैं और एक दूसरे का आदर सम्मान करने वाले लोग हैं।

बुधवार, 15 जून 2016

 अलविदा मुद्राराक्षस जी ( संस्मरण )       -(लेखक दयानंद पांडेय के ब्लॉग 'सरोकारनामा' से साभार)
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अगर मुद्राराक्षस के लिए मुझ से कोई एक वाक्य में पूछे तो मैं कहूंगा कि हिंदी जगत अगर चंबल है तो मुद्राराक्षस इस चंबल के बाग़ी हैं । जन्मजात बाग़ी । ज़िंदगी में उलटी तैराकी और सर्वदा धारा के ख़िलाफ़ चलने वाला कोई व्यक्ति देखना हो तो आप लखनऊ आइए और मुद्राराक्षस से मिलिए। आप हंसते , मुसकुराते तमाम मुर्दों से मिलना भूल जाएंगे। हिप्पोक्रेटों से मिलना भूल जाएंगे । मुद्राराक्षस की सारी ज़िंदगी इसी उलटी तैराकी में तितर-बितर हो गई लेकिन इस बात का मलाल भी उन को कभी भी नहीं हुआ । उन को कभी लगा नहीं कि यह सब कर के उन्हों ने कोई ग़लती कर दी हो । वास्तव में हिंदी जगत में वह इकलौते आदि विद्रोही हैं। बहुत ही आत्मीय किस्म के आदि विद्रोही। पल में तोला , पल में माशा ! वह अभी आप से नाराज़ हो जाएंगे और तुरंत ही आप पर फ़िदा भी हो जाएंगे । वह कब क्या कर और कह बैठेंगे , वह ख़ुद नहीं जानते। लेकिन जानने वाले जानते हैं कि वह सर्वदा प्रतिपक्ष में रहने वाले मानुष हैं । वह जब बतियाते हैं और अतीत में जाते हैं तो लगता है कि कोलकाता में ज्ञानोदय की नौकरी का समय उन के जीवन का गोल्डन  पीरियड था। हालां कि वह ऐसा शब्द या कोई भावना व्यक्त नहीं करते । लेकिन जब एक बार मैं नवभारत टाइम्स में था तब बातचीत में जो भाव उन के शब्दों में आए , उन से मैं ने यह निष्कर्ष निकाला है । हो सकता है मेरा यह आकलन सही भी हो , हो सकता है मेरा यह आकलन ग़लत भी हो । कुछ भी हो सकता है । पर कोलकाता के ज्ञानोदय और उस में अपनी नौकरी का ज़िक्र वह तब के दिनों बड़े गुमान से करते मिले थे । मुद्राराक्षस ने आकाशवाणी की गरिमामयी नौकरी भी की है । तब के दिनों वह असिस्टेंट डायरेक्टर हुआ करते थे । पर यूनियनबाज़ी में वह गिरिजा कुमार माथुर से मोर्चा खोल बैठे । झगड़ा जब ज़्यादा बढ़ गया तो वह नौकरी से बेबात इस्तीफ़ा दे बैठे । नौकरी में समझौता कर के जो रहे होते मुद्राराक्षस तो बहुत संभव है वह डायरेक्टर जनरल हो कर रिटायर हुए होते । नहीं डायरेक्टर जनरल तो डिप्टी डायरेक्टर जनरल हो कर तो रिटायर हुए ही होते । जैसे कि उन के साथ के तमाम लोग हुए भी । अच्छी ख़ासी पेंशन पा कर ऐशो आराम की ज़िंदगी गुज़ार रहे होते । लेकिन मुद्रा का चयन यह नहीं था । सुभाष चंद्र गुप्ता उर्फ़ मुद्राराक्षस तो जैसे संघर्ष का पट्टा लिखवा कर आए हैं इस दुनिया में । घर में , बाहर , साहित्य और ज़िंदगी में भी । मुद्रा तो जब दिनकर की उर्वशी की जय जयकार के दिन थे तब के दिनों उन्हों ने अपनी लिखी समीक्षा में उर्वशी की बखिया उधेड़ दी थी । नाराज हो कर दिनकर ने उन से कहा कि  कुत्तों की तरह समीक्षा लिखी है । तो मुद्रा ने पलट कर दिनकर से कहा कि कुत्तों के बारे में कुत्तों की ही तरह लिखा जाता है । दिनकर चुप हो गए थे । ऐसा मुद्रा ख़ुद ही बताते हैं ।

मुद्राराक्षस शुरुआती दिनों में लोहियावादी थे । लोहिया के मित्र भी वह रहे । इतना कि  रंगकर्मी शिराज जी से मुद्राराक्षस का विवाह भी लोहिया ने ही करवाया। लेकिन यह देखिए बाद के दिनों में लोहिया से मुद्रा का मोहभंग हो गया । मुद्रा वामपंथी हो गए । लोहिया को फासिस्ट लिखने और बताने लग गए मुद्राराक्षस । बात यहीं नहीं रुकी मुद्रा जल्दी ही वामपंथियों के कर्मकांड पर टूट पड़े । माकपा एम को वह भाजपा एम कहने से भी नहीं चूके । सब जानते हैं कि मुद्राराक्षस एक समय अमृतलाल नागर के शिष्य थे । न सिर्फ़ शिष्य बल्कि उन का डिक्टेशन भी लेते थे । नागर जी की आदत थी बोल कर लिखवाने की । बहुत लोगों ने नागर जी का डिक्टेशन लिया है । मुद्रा भी उन में से एक हैं । मुद्रा नागर जी के प्रशंसकों में से एक रहे हैं । लेकिन कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के एक कार्यक्रम में अमृतलाल नागर पर जब उन्हें बोलने के लिए कहा गया तो मुद्राराक्षस ने जैसे फ़तवा जारी करते हुए कहा कि अमृतलाल नागर बहुत ही ख़राब उपन्यासकार थे । उपस्थित श्रोताओं , दर्शकों में उत्पात मच गया । नागर जी के तमाम प्रशंसक मुद्राराक्षस पर कुपित हो गए । लेकिन मुद्रा अड़ गए तो अड़ गए । नागर जी को वह ख़राब उपन्यासकार बताते ही रहे । इसी तरह एक समय मुद्राराक्षस भगवती चरण वर्मा को जनसंघी बताते नहीं थकते थे ।

लेकिन सब कुछ और सारे जीवट के बावजूद मुद्राराक्षस इस सब में बिखर गए । मुद्रा इस अकेले किए जाने के दुष्चक्र और अपमान की आह में बिन कुछ बोले घुलते गए हैं । तिस पर उन की उलटी तैराकी और धारा के विरुद्ध चलने , और एकला चलो की ज़िद उन्हें निरंतर पथरीली राह पर ढकेलती रही है । जवानी में तो सब कुछ संभव बन जाता है । कैसे भी , कुछ भी हो जाता है । लेकिन उम्र के साथ बदलते समय से मुद्राराक्षस ने आज भी समझौता नहीं किया है । एकला चलो की उन की ज़िद और जीवन शैली उन्हें शायद आज भी कहीं सहेजती है , ताकत देती है उन्हें । पर बिखरने से बचा नहीं पाती । तिस पर उन पर किसिम-किसिम के आक्रमण भी दाएं-बाएं से जब-तब होते ही रहते हैं । ख़ास कर प्रेमचंद को दलित विरोधी कह कर जैसे उन्हों ने बर्रइया के छत्ते में हाथ ही डाल दिया था । फिर तो क्या-क्या नहीं कहा गया । यह भी कि वह सुनार भी हैं ।

सच यह है कि लखनऊ में एक समय यशपाल , भगवती चरण वर्मा और अमृतलाल नागर की त्रिवेणी कही जाती थी । मतभेद उन में भी थे । होते ही थे । स्वाभाविक है । लेकिन वह लोग अपने मतभेद भी एक गरिमा के तहत ही निपटा लिया करते थे । वाकये कई सारे हैं । पर प्रसंगवश एक वाकया सुनाता हूं यहां । लखनऊ के महानगर कालोनी में भगवती चरण वर्मा का घर तब के दिनों बन चुका था । यशपाल जी का घर निर्माणाधीन था । भगवती बाबू के घर चित्रलेखा में कई सारे लेखक एक दिन बैठे थे । यशपाल और नागर जी भी थे । किसी ने यशपाल जी को सलाह दी कि आप भी अपने घर का नाम दिव्या रख लीजिए । यशपाल जी सुन कर भी टाल गए यह बात । लेकिन जब यह बात फिर से दुहराई गई तो यशपाल जी ने बहुत धीरे से प्रतिवाद किया और कहा कि मैं ने सिर्फ़ दिव्या ही नहीं लिखा है । बात आई , गई हो गई । किसी ने किसी की बात का बुरा भी नहीं माना । और नागर जी के पास तो जीवन पर्यंत अपना घर नहीं हो पाया । किराए के घर में ही वह अंतिम सांस लिए । ख़ैर , मैं मानता हूं की इस त्रिवेणी के विदा होने के बाद भी लखनऊ में एक त्रिवेणी पुनः उपस्थित थी । श्रीलाल शुक्ल , मुद्राराक्षस और कामतानाथ की त्रिवेणी । तीनों ही बड़े लेखक हैं । पर दुर्भाग्य से यह त्रिवेणी अपनी वह गरिमा शेष नहीं रख पाई । जो यशपाल , भगवती चरण वर्मा और अमृतलाल नागर की त्रिवेणी ने विरासत में छोड़ी थी । इस में श्रीलाल शुक्ल की जो एक्सरसाइज थी , सो तो थी ही , मुद्राराक्षस की एकला चलो की ज़िद , धारा के विरुद्ध चलने की अदा भी कम नहीं रही है । जैसे कि मुझे याद है कि जब कामतानाथ की पचहत्तरवीं जयंती मनाई गई तो उस कार्यक्रम की अध्यक्षता मुद्राराक्षस को ही करनी तय हुई थी । पर ऐन वक़्त पर मुद्रा ने आने से इंकार कर दिया । ऐसे और भी तमाम वाकये मुद्राराक्षस के जीवन में उपस्थित हैं । जैसे कि वह मुद्रा के आला अफसर की बहार के दिन थे । तब सोवियत संघ का ज़माना था । दर्पण के लोगों द्वारा आला अफसर के मंचन का कार्यक्रम सोवियत संघ के कई शहरों में बनाया गया । सोवियत संघ के ख़र्च पर । सभी कलाकारों के पासपोर्ट आदि बन गए । तारीखें तय हो गईं । सब ने जाने की अप्रतिम तैयारी कर ली । ऐन वक्त पर मुद्राराक्षस बिदक गए । सोवियत संघ में एक परंपरा सी थी कि नाटक के मंचन के लिए लेखक की लिखित अनुमति भी ज़रूरी होती थी । मुद्राराक्षस ने लिखित अनुमति देने से साफ इंकार कर दिया । दर्पण के लोगों ने बहुत समझाया । मनुहार किया । कहा कि आप को भी चलना है । मुद्रा बोले , मुझे जाना ही नहीं है । सोवियत संघ में आला अफ़सर का वह मंचन रद्द हो गया । दर्पण के लोग इस बाबत आज भी मुद्राराक्षस को माफ़ नहीं करते । मुद्रा का नाम आते ही किचकिचा पड़ते हैं । गरिया देते हैं । असल में मुद्रा के यहां असहमतियां बहुत हैं और उन से असहमत लोग भी बहुत हैं । बेभाव कहिए या थोक के भाव कहिए ।

लेकिन मुद्राराक्षस तो ऐसे ही हैं । वह अमूमन किसी के शादी - व्याह में  या पारंपरिक कार्यक्रम में भी कहीं नहीं देखे जाते । वह बुलाने पर भी नहीं जाते । एक समय एक फीचर एजेंसी राष्ट्रीय फ़ीचर्स नेटवर्क में मैं संपादक था । इस का कार्यालय तब विधानसभा मार्ग पर आकाशवाणी से सटा हुआ था । एक बार वहां मुद्राराक्षस अचानक आ गए । मैं बहुत ख़ुश हुआ । उन से लिखने का आग्रह किया । वह तुरंत मान गए । यह वर्ष 1994 -1995 का समय था । वह पहले हफ्ते में एक लेख लिखते थे । बाद में दो लेख लिखने लगे । विविध विषयों पर । बस उन की शर्त होती थी कि हर हफ़्ते भुगतान मिल जाना चाहिए । लेख चाहे जब छपे । तो वह हफ़्ते में तीन बार आते । दो बार लेख देने , एक बार भुगतान लेने । मुझ पर प्यार भी बहुत लुटाते । इसी प्यार के वशीभूत एक बार पारिवारिक कार्यक्रम में बुलाते हुए निमंत्रण पत्र दिया उन्हें । उन्हों ने आने से साफ इंकार कर दिया । कहने लगे ऐसे किसी कार्यक्रम में नहीं आता-जाता । मैं चुप रह गया था तब । बहुत बार किसी के निधन आदि पर अंत्येष्टि में भी वह अनुपस्थित होते हैं। हां  , लेकिन तीन बार अभी तक मैं ने उन्हें लोगों के निधन पर ज़रूर देखा है । एक अमृतलाल नागर के निधन पर वह बहुत ग़मगीन मिले भैसाकुंड पर । दूसरी बार राजेश शर्मा की आत्महत्या के बाद उन के घर पर उन के परिवार को सांत्वना देते हुए । और तीसरी बार श्रीलाल शुक्ल के निधन पर फिर भैसाकुंड पर । बहुत विचलित मुद्रा में । मुद्राराक्षस को जितना परेशान और विचलित श्रीलाल शुक्ल के निधन पर  देखा , उतना परेशान और विचलित मैं ने उन्हें कभी नहीं देखा । लगता था कि जैसे उन से , उन का क्या छिन गया है । ऐसे जैसे वह किसी गहरी यातना में हों । उन के चेहरे पर छटपटाहट की वह अनगिन रेखाएं मेरी आंखों में जैसे आज भी जागती मिलती हैं । तो इस का कारण भी है । श्रीलाल शुक्ल और मुद्राराक्षस दोनों का विविध विषयों पर अध्ययन लाजवाब था । विद्वता की प्रतिमूर्ति हैं दोनों । हिंदी , अंगरेजी , संस्कृत और संगीत पर दोनों की ही अद्भुत पकड़ थी , है ही । फ़र्क बस यह रहा कि मुद्राराक्षस ने कई बार अपने अतिशय अध्ययन का अतिशय दुरूपयोग किया है । ध्वंस की हद तक दुरुपयोग किया है । और उसे एकला चलो की ज़िद पर कुर्बान कर दिया है । बारंबार । श्रीलाल जी ने अपने अध्ययन का सुसंगत उपयोग किया है । कहूं कि मैनेज किया है । और इसी ' मैनेज ' के दम पर अनगिन बार मुद्राराक्षस को वह प्रकारांतर से उकसाते रहे हैं और मुद्राराक्षस अतियों की भेंट चढ़ते गए हैं । निरंतर ।

मुद्राराक्षस से जब मैं पहली बार मिला तब बीस साल का था । यह 1978 की बात है । गोरखपुर में मैं विद्यार्थी था । संगीत नाटक अकादमी की नाट्य प्रतियोगिता में मुद्राराक्षस बतौर ज्यूरी मेंबर गोरखपुर गए थे । लखनऊ से विश्वनाथ मिश्र और दिल्ली से देवेंद्र राज अंकुर भी बतौर ज्यूरी मेंबर पहुंचे थे गोरखपुर । अमृतलाल नागर ने उद्घाटन किया था । मुद्रा उन दिनों हाई हिल का जूता , मोटी नाट वाली टाई बांधे छींटदार बुश्शर्ट और कोट पहने मिले थे । सब लोग होटल में ठहरे थे पर मुद्राराक्षस परमानंद श्रीवास्तव के घर पर ठहरे थे । तब मुद्रा से मैं ने एक इंटरव्यू भी किया था । और उन से मिल कर एक नई ऊर्जा से भर गया था । उन दिनों वह रामसागर मिश्र कालोनी में रहते थे, जो अब इंदिरा नगर है । उन से चिट्ठी-पत्री होने लगी थी । वह इंटरव्यू दैनिक जागरण के संपादकीय पृष्ठ पर तब के दिनों छपा भी था । उन्हीं दिनों मैं परिचर्चाएं भी बहुत लिखता था । रंगकर्मियों को ले कर एक परिचर्चा खातिर उन्हों ने तब न सिर्फ़ कई सारे नाम सुझाए बल्कि सब के पते भी लिखवाए । बंशी कौल , सुरेका सीकरी , मनोहर सिंह , उत्तरा  बावकर जैसे कई रंगकर्मियों के पते उन्हें तब जुबानी याद थे । कहा कि सब को मेरा नाम भी लिख सकते हैं , जवाब आएगा । सचमुच सब का जवाब आया था तब । बाद के दिनों मैं लखनऊ आता तो शाम के समय काफी हाऊस में प्रबोध मजूमदार , राजेश शर्मा के साथ वह एक कोने की मेज पर बैठे मिल जाते थे ।

मुद्राराक्षस ने राजनीतिक जीवन भी जिया है । दो बार चुनाव भी लड़ा है इसी लखनऊ में और अपनी ज़मानत भी ज़ब्त करवाई है । लेकिन राजनीति में भी कभी उन्हों ने समझौता नहीं किया है । कभी किसी के पिछलग्गू नहीं बने हैं । किसी की परिक्रमा नहीं की है । गरज यह कि साहित्य और ज़िंदगी की तरह वह राजनीति में भी सर्वदा अनफिट ही रहे हैं । नरसिंहा राव तब के दिनों प्रधानमंत्री थे । मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे । डंकल प्रस्ताव की दस्तक थी । पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह लखनऊ के एक सेमिनार में आए थे । सहकारिता भवन में  आयोजित डंकल प्रस्ताव के खिलाफ यह सेमिनार था । तमाम ट्रेड यूनियन के लोग उस में उपस्थित थे । विश्वनाथ प्रताप सिंह तब जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे । मुद्राराक्षस तब के दिनों लखनऊ शहर जनता दल के अध्यक्ष थे । कार्यक्रम शुरू होने की औपचारिकता हो चुकी थी । विश्वनाथ प्रताप सिंह मंच पर उपस्थित थे । अचानक मुद्राराक्षस आए । सुरक्षा जांच के तहत मेटल डिटेक्टर से गुज़रने को उन्हें कहा गया । मुद्रा बिदक गए । सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें समझाया कि पूर्व प्रधानमंत्री की सुरक्षा से जुड़ी यह प्रक्रिया है । मुद्रा का बिदकना जारी रहा । कहा कि मैं उन की पार्टी का शहर अध्यक्ष हूं , मुझ से भी ख़तरा है उन्हें ? और जब बिना जांच के उन्हें घुसने से मना कर दिया गया तो वह पलट कर कार्यक्रम से बाहर निकल गए । विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंच पर बैठे ही बैठे सब देख रहे थे । उन्हों ने कुछ कार्यकर्ताओं से कहा कि अरे , मुद्रा जी नाराज़ हो कर जा रहे हैं । उन्हें मना कर ले आइए । उन्हों ने पूर्व विधायक डी पी बोरा और उमाशंकर मिश्रा को इंगित भी किया । यह लोग लपक कर मुद्रा के पीछे लग गए । मुद्रा को मनाने लगे । लेकिन मुद्रा तो यह गया , वह गया हो गए । विधान भवन तक लोग मुद्रा को मनाते हुए आए । लेकिन मुद्रा नहीं लौटे तो नहीं लौटे । मैं उन दिनों नवभारत टाइम्स में था । कार्यक्रम की रिपोर्टिंग के लिए आया था । लेकिन कार्यक्रम छोड़ कर मैं भी साथ-साथ लग लिया यह देखने के लिए कि मुद्रा मानते हैं कि नहीं । मैं ने देखा कि मुद्रा किसी की बात सुनने को भी तैयार नहीं थे । लगातार कहते रहे कि अब इस अपमान के बाद लौटना मुमकिन नहीं है ।

मुद्राराक्षस के साथ ऐसी अनगिन घटनाएं उन के जीवन में उपस्थित हैं । भारत में उन दिनों विदेशी चैनलों की दस्तक और आहट के दिन थे । वर्ष 1996 की बात है । मीडिया मुगल रूपर्ट मर्डोक ने स्टार में एडवाइजर बनाने के लिए बात करने को बुलाया था । निमंत्रण प्रस्ताव के साथ ही डॉलर वाला चेक भी नत्थी था । उन दिनों मैं राष्ट्रीय सहारा में आ चुका था । एक दिन मुद्रा जी राष्ट्रीय सहारा आए और रूपर्ट मर्डोक की वह चिट्ठी दिखाई सब के बीच और डॉलर वाला चेक भी । कहने लगे कि लेकिन मैं जाऊंगा नहीं । मेरे मुंह से निकल गया कि फिर यह चेक भी क्यों दिखा रहे हैं ? मुद्रा हंसे । और वह डॉलर वाला चेक तुरंत फाड़ कर रद्दी की टोकरी में डाल दिया । मुद्राराक्षस के बहुत से उपकार मुझ पर हैं । पर एक उपकार के ज़िक्र का मोह छोड़ नहीं पा रहा हूं । एक बार नागर जी पर लिखे एक संस्मरणात्मक लेख में संकेतों में ही सही उन की ज़िंदगी में आई कुछ स्त्रियों का ज़िक्र कर दिया था । नागर जी से अपनी एक पुरानी बातचीत के हवाले से । राष्ट्रीय सहारा के संपादकीय पृष्ठ पर यह संस्मरणात्मक लेख छपा था । उस में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं था । लेकिन दफ़्तर के ही कुछ सहयोगियों ने नागर जी के सुपुत्र शरद नागर को भड़का दिया । शरद नागर मेरे ख़िलाफ़ लिखित शिकायत ले कर उच्च प्रबंधन के सम्मुख उपस्थित हो गए । मुझ से स्पष्टीकरण मांग लिया गया । मैं ने स्पष्टीकरण तो दे दिया पर संकट फिर भी टला नहीं था । जाने कैसे मुद्राराक्षस को यह सब पता चल गया । फोन कर के मुझ से दरियाफ़्त किया । मैं ने पूरा वाकया बताया । मुद्रा बोले , इस में ग़लत तो कुछ भी नहीं है । तुम ने कुछ भी ग़लत नहीं लिखा है । बल्कि बहुत कम लिखा है । ऐसे विवरण तो बहुत हैं नागर जी के जीवन में । मुझे बहुत पता है । और फिर कई और सारे वाकये बताए उन्हों ने । मुद्रा यहीं नहीं रुके । बिना मेरे कहे उच्च प्रबंधन से भी वह अनायास मिले और मेरी बात की पुरज़ोर तस्दीक की । कहा कि कुछ भी ग़लत नहीं लिखा है । बात ख़त्म हो गई थी ।

हज़रतगंज के काफी हाऊस में उन के साथ बैठकी के तमाम वाकये हैं । लेकिन एक वाकया भुलाए नहीं भूलता।  एक जर्मन स्कालर आई थी । वह भारतीय नाटकों और संगीत के बारे में जानना चाहती थी । वीरेंद्र यादव , राकेश , आदि कुछ और लोग भी थे । हिंदी उस की सीमा थी । अंगरेजी और संस्कृत लोगों की सीमा थी । अचानक मुद्राराक्षस ने हस्तक्षेप किया । और जिस तरह बारी-बारी संस्कृत और अंगरेजी में धाराप्रवाह बोलना शुरू किया , वह अद्भुत था । हम अवाक् देखते रहे मुद्रा को । एक बार ऐसे ही कैसरबाग़ के कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर में संस्कृत के कोट दे-दे कर भरत मुनि के नाट्य शास्त्र की धज्जियां उड़ाते मैं मुद्रा को देख चुका था । लेकिन काफी हाऊस में मुद्रा की यह विद्वता देख कर मैं ही क्या सभी दंग थे । काफी हाऊस में पिन ड्राप साइलेंस था तब । भारतीय नाटकों और संगीत पर ऐसी दुर्लभ जानकारियां मुद्रा जिस अथॉरिटी के साथ परोस रहे थे , जिस तल्लीनता से परोस रहे थे वह विरल था । वह जर्मन स्कालर जैसे गदगद हो कर गई थी । उस की गगरी भर गई थी , ज्ञान के जल से । मुद्रा के लिए उस के पास आभार के शब्द नहीं रहा गए थे । निःशब्द थी वह । और हम मोहित । बाद के दिनों में एक दोपहर रस रंजन के समय इस घटना का ज़िक्र बड़े सम्मोहन के साथ मैं ने श्रीलाल शुक्ल से एक बैठकी में किया । श्रीलाल जी अभिभूत थे यह सुन कर। फिर धीरे से बोले अध्ययन तो है ही उस आदमी के पास । मैं ने जोड़ा , और शार्पनेस भी । श्रीलाल जी ने हामी भरी, सांस ली । और अफ़सोस के साथ बोले पर इस सब का तो वह लगभग दुरूपयोग ही कर रहे हैं ! लखनऊ मेरा लखनऊ में मनोहर श्याम जोशी ने आज के मुद्राराक्षस को तब के सुभाष चंद्र गुप्ता को जिस तरह उपस्थित किया है वह भी अविस्मरणीय है ।

स्त्री और दलित विमर्श के लिए झंडा भले राजेंद्र यादव के हाथ में चला गया था लेकिन मुद्राराक्षस के ज़रूरी हस्तक्षेप को हम भला कैसे भूल सकते हैं ? हां , यह भी ज़रूर है कि मुद्रा इस विमर्श में अति की हद तक निकल जाते रहे हैं । शायद इसी लिए वह कई बार बहुत लोगों को हजम नहीं हो पाते । उन की बात लोगों को चुभ-चुभ जाती है । मुद्रा का मकसद भी यही  होता है कि उन की बात लोगों को चुभे और ख़ूब चुभे । लेकिन इस फेर में वह दाल में नमक की जगह नमक में दाल भी ख़ूब करते रहे हैं । और बहुतेरे लोगों के लिए जहरीले बन कर उपस्थित होते रहे हैं । लेकिन मुद्रा ने कभी इस सब की परवाह नहीं की है । शायद करेंगे भी नहीं । उर्दू को दूसरी राजभाषा बनाने के लिए भी उन के संघर्ष को कैसे भूला जा सकता है ? कई-कई दिन तक उन्हें विधान भवन के सामने हमने धरना देते देखा है । बार-बार इस के लिए लड़ते देखा है । एक समय दलित मुद्दों को ले कर वह बहुत सक्रिय थे । मायावती उन्हीं दिनों मुख्यमंत्री बनीं । लोग कहने लगे कि हिंदी संस्थान की कुर्सी हथियाने का उपक्रम है यह । मैं ने लोगों से कहा कि फिर आप लोग मुद्राराक्षस को नहीं जानते । वह कैसे बन सकते थे ? बाग़ी और किसी कुर्सी पर ? नामुमकिन ! समाज के और ज़रूरी मसलों पर भी उन्हें जूझते देखा ही है लखनऊ की सड़कों ने , लोगों ने । मुद्रा चुप मार कर बैठ जाने वालों में से नहीं हैं । हार शब्द तो जैसे उन की डिक्शनरी में ही नहीं है । अख़बारी कालमों में उन की आग की तरह दहकती टिप्पणियां अभी भी मन में सुलगती मिलती हैं । वैसे भी वह कहानी , उपन्यास , नाटक आदि की जगह विचार को ज़्यादा तरजीह देते रहते हैं । घर की उन की लाइब्रेरी में भी साहित्य से ज़्यादा वैचारिक किताबें ज़्यादा मिलती हैं । रंगकर्मी राकेश उन्हें बुद्ध , कबीर और ग़ालिब का समुच्चय मानते हैं । राकेश ठीक ही कहते हैं । हां , यह ज़रूर है कि ग़ालिब और कबीर उन में ज़्यादा हैं । बुद्ध कम । ऐसा मेरा मानना है । राकेश ग़ालिब का एक क़िस्सा सुनाते हैं । कि ग़ालिब मस्जिद , नमाज़ , वमाज के फेर में नहीं पड़ते थे । पर एक बार शराब का टोटा पड़ा तो वह नमाज़ के लिए मस्जिद गए । अभी वजू कर ही रहे थे कि उन का एक साथी उन्हें पुकारते हुए , बोतल दिखाते हुए बोला कि , ग़ालिब साहब , ले आया हूं ! ग़ालिब बिना नमाज़ के लौटने लगे तो मौलवी ने टोका कि बिना नमाज़ के क्यों जा रहे हैं ? ग़ालिब बोले , जब वजू में ही क़ुबूल हो गई तो नमाज़ का क्या करना ! और मस्जिद से बाहर आ गए । मुद्रा के साथ भी यह सब है । मुद्रा के साथ रस-रंजन के भी कई क़िस्से हैं । लेकिन अभी एक ताज़ा क़िस्सा सुनिए । कथाक्रम में डिनर की रात शैलेंद्र सागर ने मुद्रा को घर पहुंचाने का जिम्मा मुझ पर डाल दिया । मैं ने सहर्ष स्वीकार लिया । अब हम दुर्विजय गंज की गलियों में भटक गए । मुद्रा जी भी अपनी गली नहीं पहचान पा रहे थे । भटकते-भटकते हम लोग मोती नगर की गलियों में बड़ी देर तक घूमते रहे । खैर किसी तरह पहुंचे 78 दुर्विजय गंज । अब दूसरे दिन भी लंच के बाद शैलेंद्र सागर ने फिर मुझे मुद्रा जी को घर पहुंचाने का जिम्मा दे दिया । मैं अचकचाया । उन्हें रात का क़िस्सा बयान किया । और बताया कि कल तो रात थी , अब दिन है , कार को बैक करने मोड़ने में भीड़ के कारण मुश्किल होगी । गलियां पतली हैं । शैलेंद्र सागर नहीं माने । एक सहयोगी ज़रुर साथ दे दिया । मदद के लिए । कि अगर घर तक कार न भी पहुंच पाए तो यह सहयोगी घर तक मुद्रा को पहुंचा देगा । अब यूनिवर्सिटी पेट्रोल  पंप पर पेट्रोल डलवाते समय मुद्रा ने उस सहयोगी से कुछ कहा । कहा कि पुल पार करते ही बाईं तरफ दुकान है । अब पुल पार करते ही उन्हों ने रुकने को कहा । मैं रुक गया । अब वह सहयोगी कार से उतरने को तैयार नहीं हो रहा था । मुद्रा बुदबुदाते हुए ह्विस्की की बात कर रहे थे । मैं ह्विस्की को बिस्किट सुन रहा था । मैं ने कहा भी कि आगे भी बहुत दुकानें मिलेंगी । मुद्रा बोले , यहीं ठीक रहेगा ।  मैं ने कहा कि कोई खास ब्रांड का बिस्किट है क्या ? साथ में कवियत्री शीला पांडेय जी भी थीं । वह बोलीं , बिस्किट नहीं , ह्विस्की कह रहे हैं । तब मैं अचकचाया । उस सहयोगी का कहना था कि मेरे गांव का या कोई परिचित देख लेगा तो क्या कहेगा ? और उस ने शराब की दुकान पर ह्विस्की लेने जाने से साफ इंकार कर दिया । मैं शराब आदि कभी ख़रीदता नहीं । सो मैं ने भी मना कर दिया । रास्ते में मुद्रा लगातार कहते  रहे अब तुम  मेरे दोस्त नहीं रहे । बुदबुदाते रहे , तुम कितने अच्छे दोस्त थे । लेकिन अब दोस्त नहीं रहे । आदि-आदि । मैं चुपचाप सुनता रहा । खैर इतवार होने के नाते बहुत भीड़ नहीं थी । सो कार कहीं फंसी नहीं । उन के घर आराम से पहुंच गए हम लोग । मुद्रा को कार से उतार कर उन के घर में दाखिल करते हुए  लगभग उन से माफ़ी मांगते  हुए कहा कि  माफ़ कीजिए , आप की फरमाइश पूरी नहीं कर पाया । मुद्रा ने मेरी पूरी बात सुने बिना कहा कोई माफ़ी नहीं , मुझे आग्नेय नेत्रों से देखा और फिर दुहराया कि अब तुम मेरे दोस्त नहीं रहे , भाग जाओ ! और घर में अकेले घुस गए । लेकिन कल जब मुद्रा जी अपनों के बीच कार्यक्रम में वह मिले तो लपक कर गले लगा लिया मुझे । वैसे ही बच्चों की तरह निश्छल हंसी में मुदित । सर्वदा की तरह ।

कल उन के  जन्म-दिन की पूर्व संध्या पर यह कार्यक्रम सचमुच मुद्रा जी के लिए ही नहीं , लखनऊ के लिए भी सौभाग्य बन कर आया । जिस तरह तमाम लेखक , रंगकर्मी मुद्रा जी से सारे भेद-मतभेद बुला कर इकट्ठा हुए वह बहुत ही सैल्यूटिंग है । पूरा कार्यक्रम सब को ही इतना भावुक कर देने वाला था कि पूछिए मत । धाराप्रवाह बोलने वाले , बोलने में हरदम कठोर रहने वाले मुद्रा कल किसी मोमबत्ती की तरह पिघलते रहे , किसी बर्फ़ की सिल्ली की तरह गल-गल कर बहते रहे भावनाओं में । इतना कि जब उन के बोलने का समय आया तो वह ठीक से बोल नहीं पाए । कहा भी कई बार कि मैं आज ठीक से बोल नहीं पा रहा । लोगों ने समझा कि अस्वस्थता के कारण , कमजोर हो जाने के कारण वह नहीं बोल पा रहे । लेकिन सच यह नहीं था । सच यह था कि वह बहुत भावुक हो गए थे अपने सम्मान में बिछे सब को देख कर । इतना अपनत्व पा कर । अब तक उपेक्षित चले आ रहे व्यक्ति को अगर समूचा लखनऊ एक साथ सैल्यूट करने उतर आया हो तो कोई भी हो  , भले ही वह मुद्राराक्षस जैसा बाग़ी ही क्यों न हो , भावुक तो हो ही जाएगा । वह तो मुद्राराक्षस थे , उन की जगह जो कोई और होता तो वह मारे ख़ुशी के विह्वल हो कर रो पड़ता । सच मुद्रा को मैं ने जाने कितनी गरमी , बरसात , जाड़ा भोगते देखा है । जाने कितने संघर्ष , जीते-मरते और लड़ते देखा है । पर जितना भावुक होते कल उन्हें देखा है , कभी नहीं देखा । इस तरह तो नहीं ही देखा । एक बाग़ी भी भावुक हो सकता है , फिल्मों में तो बहुत बार देखा है , जीवन में पहली बार कल देखा है । हिंदी जगत के इस चंबल के बाग़ी को सत-सत नमन!

(लेखक दयानंद पांडेय के ब्लॉग 'सरोकारनामा' से साभार)
सादर श्रद्धांजलि!!!!
सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य जगत की ओर से..........

सोमवार, 28 दिसंबर 2015

शील निगम. आगरा (उ. प्रदेश )में जन्म ६ दिसम्बर , १९५२ . शिक्षा-बी.ए.बी.एड. कवयित्री, कहानी तथा स्क्रिप्ट लेखिका. मुंबई में १५ वर्ष प्रधानाचार्या तथा दस वर्षों तक हिंदी अध्यापन. विद्यार्थी जीवन में अनेक नाटकों,लोकनृत्यों तथा साहित्यिक प्रतियोगिताओं में सफलतापूर्वक प्रतिभाग एवं पुरुस्कृत.
हाल ही में 'प्रतिलिपि.कॉम' में सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली कहानी 'रेपिस्ट' पर पुरस्कार प्राप्ति। 
सम्मान-
डॉ आंबेडकर फेलोशिप अवार्ड से सम्मानित. (दिल्ली) "हिंदी गौरव सम्मान से सम्मानित (लंदन )
पता-
पता-बी,४०१/४०२,मधुबन अपार्टमेन्ट, फिशरीस युनीवरसिटी रोड, सात बंगला के पास,वर्सोवा,अंधेरी (पश्चिम),मुंबई-६१. मोबाईल नंबर- 9987464198,9987490692 फोन नम्बर- 022-26364228.
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'ये आँसू'



ये आँसू ... 

पारदर्शी मोती!

सतरंगी किरणों से चमक उठते हैं,

जब खुशगवार होता है मन.... 

मन का ही तो दर्पण हैं ये आँसू,  

झूम-झूम जाता है मन तब, 

जब झर-झर बहते हैं ख़ुशी के आँसू,
यादों के झरोखे से उठती हैं 

मिलन की साँसे … 

झूम झूम जाता है मन तब,

जब झर-झर बहते हैं ख़ुशी के आँसू 

भीग जाता है दामन। 

यही आँसू जब बिखरते हैं 

यादों में, विरह की पीड़ा लिए हुए,

टूट टूट जाता है मन....  

जब झर-झर बहते हैं खून के आँसू 

भीग जाता है दामन। 

काश ! ये आँसू भी अपना रंग छोड़ सकते ...
रंगीन हो जाता दामन 

विरह और मिलन के रंगों से।
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शील निगम (२८. १२. २०१५ ) मुंबई

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

ग़ज़ल

बंदूक से ज़्यादा ख़तरनाक टख़नों से ऊपर चढ़ी मोहरियाँ लग रही हैं।
मुझे तो दुनिया अब ख़त्म  कर देने  की सारी तय्यारियाँ लग रही हैं।

फूल क्यों न खिला अबतक, मैंने तो बड़े जतन से इसको सींचा था,
देखो साज़िश करती हुई, कुसूरवार मुझे  ये क्यारियाँ  लग रही हैं।

जाने कैसा ज़हर हवा  में शामिल  होकर फैलता जा रहा है चुपचाप,
नए-नए असरात हो रहे हैं और रोज़ नई-नई बीमारियाँ लग रही हैं।

होश आने पर देखेंगे  ये मंज़र जब  उजड़ा हुआ तो फिर कुछ न होगा,
अभी तो नशेमन हैं जाने किस नशे की लत की खुमारियाँ लग रही हैं।

है हवा तेज़, शोला बनके दहकेगी एक आग पूरा वतन जल जाएगा।
बुझा दो  इनको  'तनहा'  तुम जो  कहीं  चिनगारियाँ  लग  रही  हैं।

©मोहसिन 'तनहा'